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मुख्यमंत्री ने समाधान यात्रा के क्रम में अररिया जिले की जीविका दीदियों के साथ किया संवाद

PATNA : मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज समाधान यात्रा के क्रम में अररिया जिले की जीविका दीदियों के साथ संवाद कार्यक्रम में शामिल हुए। अररिया खेल भवन में आयोजित संवाद कार्यक्रम में 300 जीविका दीदियों ने हिस्सा लिया। संवाद कार्यक्रम में जीविका समूह के माध्यम से उत्कृष्ट कार्य करने वाली 6 जीविका दीदियों ने अपने – अपने अनुभव साझा किये। सभी ने जीविका समूह से जुड़ने के बाद अपने परिवार के जीवन स्तर में आये बदलाव को मुख्यमंत्री के समक्ष रखा।
मुख्यमंत्री से संवाद के दौरान जीविका दीदी श्रीमती बीबी फरजाना बेगम ने बताया कि स्वयं सहायता समूह से जुड़ने से पहले मेरी आर्थिक स्थिति काफी खराब थी। समूह से जुड़कर मैंने 10 हजार रुपये की आर्थिक मदद ली और रोजगार शुरू की जिससे आमदनी होने लगी। समूह से जुड़ने के बाद मुझे सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी मिली और मैंने उसका लाभ लिया फिर जीविका दीदियों ने मुझे दीदी की रसोई के काम से जोड़ दिया। मेरा जीवन धीरे-धीरे खुशहाल होता गया। मेरा परिवार अब बेहतर ढंग से जीवन यापन कर रहा है। जीविका योजना हम जैसे गरीब-गुरबे परिवार के लिए वरदान साबित हुआ है। इसके लिए मैं मुख्यमंत्री के प्रति अपना आभार प्रकट करती हूं।
जीविका दीदी श्रीमती शैला देवी ने बताया कि परिवार की आर्थिक स्थिति दयनीय होने के कारण बच्चे पढ़ नहीं पाते थे। वैसी स्थिति में यदि हम बच्चों को पढ़ाते तो उन्हें भूखे पेट रहना पड़ता। वर्ष 2014 में स्वयं सहायता समूह से जुड़कर और ऋण लेकर मैंने एक किराने की एक दुकान खोली। पैसे की बचत कर बकरी पालन का काम शुरू किया। उसके बाद मैं गाय खरीदकर दूध भी बेचने लगी। इन कामों से मुझे अच्छी आमदनी होने लगी। बच्चे पढ़ने जाने लगे। जीविका के कारण आज मेरे बच्चों को अच्छा वस्त्र, भोजन और शिक्षा उपलब्ध हो सका है। मैंने अपने एक बेटे और एक बेटी की दहेजमुक्त शादी की है। दहेज प्रथा के खिलाफ मैं लोगों को जागरूक करने का काम भी करती हूं।
जीविका दीदी श्रीमती अरुणा देवी ने बताया कि स्वयं सहायता समूह से जुड़कर मैंने आर्थिक मदद ली। उस पैसे से मैंने सिलाई मशीन खरीदी और कपड़ा सिलने का काम करना शुरू किया। उससे मेरी आमदनी हुई तो बच्चे स्कूल जाने लगे। मुझे आवास योजना, राशन कार्ड सहित अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिला। मैं गाय पालन कर दूध बेचने का काम भी करती हूं। इस तरह से प्रतिमाह मुझे 9 से 10 हजार रूपये की आमदनी हो रही है। एक शादी समारोह में मैं शामिल थी जिसमें वर पक्ष की तरफ से दहेज नहीं मिलने के कारण शादी से इंकार कर दिया गया। इसके बाद हम सभी जीविका दीदियों ने मिलकर अपनी रिश्तेदारी में ही एक लड़के की खोज की और उसकी दहेज मुक्त शादी कराई। समूह की हम सभी जीविका दीदियां शराबबंदी, बाल विवाह एवं दहेज प्रथा के खिलाफ निरंतर अभियान चला रहे हैं। लोगों को दहेज का लेन-देन न करने और बाल विवाह न करने के लिए प्रेरित भी करते हैं।
जीविका दीदी श्रीमती आशा देवी ने बताया कि हम दोनों पति-पत्नी दिव्यांग हैं। मेरे पति किसी तरह मजदूरी कर घर का खर्च चलाते थे। मुझे स्वयं सहायता समूह के बारे में जानकारी मिली तब मैं समूह से जुड़कर आर्थिक मदद ली और एक दुकान खोली दुकान से आमदनी होने पर पैसे की बचत कर एक गाय और एक बकरी खरीदी। दूध की बिक्री से आमदनी होने लगी। अब प्रतिमाह 5 हजार रुपये की बचत हो रही है। बच्चे ठीक ढंग से पढ़ रहे हैं। जीविका के कारण यह सब संभव हो सका है। मैं मुख्यमंत्री जी को धन्यवाद देती हूं ।
पशुसखी के रूप में सक्रिय जीविका दीदी श्रीमती ज्योति देवी ने बताया कि स्वयं सहायता समूह से जुड़ने से पहले मेरे परिवार में सिर्फ एक ही व्यक्ति कमाने वाला था । पैसे के अभाव में परिवार के सदस्यों को ठीक से भोजन भी नसीब नहीं था। तब मैंने समूह से जुड़कर बकरी पालन का प्रशिक्षण लिया और उसके बाद पशु सखी के रूप में मेरा चयन हुआ । बकरियों की मृत्यु दर कम करने के लिए उनके खानपान और देखरेख के संबंध में लोगों को जागरूक करने लगी। बकरियों के बीमार होने की स्थिति में उन्हें दवा देने का काम भी शुरू कराया। पशु सखी में चयन के बाद मेरी अच्छी आमदनी होने लगी। बच्चे स्कूल जाने लगे और ठीक ढंग से पढ़ाई करने लगे। मुझे एक बार आई०ए०एस० अधिकारियों के सामने बकरी पालन प्रशिक्षण के संबंध में अपना अनुभव साझा करने का मौका मिला। इससे मुझे गर्व की अनुभूति हुई। यह सब माननीय मुख्यमंत्री जी के आशीर्वाद से संभव हुआ।
सतत् जीविकोपार्जन योजना लाभार्थी जीविका दीदी श्रीमती बबीता देवी ने बताया कि पहला उनका परिवार देशी शराब और ताड़ी बेचने के काम से जुड़ा था लेकिन वर्ष 2016 में शराबबंदी लागू हो गई। इसके लागू होने के बाद उनका रोजगार खत्म हो गया। परिवार के भरण-पोषण के लिए दूसरे के खेतों में मजदूरी करनी पड़ती थी। पैसे की तंगी हो गई। बच्चे अच्छे वस्त्र के लिए तरसने लगे। उसी दौरान मुझे स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के लिए जीविका दीदियों ने सलाह दी। मैं समूह से जुड़ गई और सतत् जीविकोपार्जन योजना का मुझे लाभ मिला। मैंने एक किराना दुकान खोली। पैसे की बचत कर बकरी पालन और मुर्गीपालन का काम शुरू किया। बटाई पर खेती भी करने लगी। जीविका के कारण मेरे परिवार में खुशहाली फिर से लौट आई और बच्चों को भोजन, वस्त्र और अच्छे ढंग से शिक्षा मिलने लगी। माननीय मुख्यमंत्री जी की दुआ से मेरे परिवार की तकदीर बदल गई। मैं मुख्यमंत्री जी के प्रति अपना आभार प्रकट करती हूं।
संवाद कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि इस वर्ष समाधान यात्रा के दौरान विभिन्न जिलों का दौरा कर रहे हैं। इसी सिलसिले में जीविका दीदियों के साथ मिलने और उनकी बात सुनने का मौका मिला है। आज यहां जीविका दीदियों ने अपने अनुभव साझा किये हैं। मुझे आपलोगों की बातें सुनकर बहुत खुशी हुई। इसके लिये मैं आप सभी को बधाई देता हूं। 24 नवंबर 2005 को जब मुझे बिहार के लोगों ने काम करने का मौका दिया तो हमने स्वयं सहायता समूह की संख्या बढ़ाने का निर्णय लिया। उसके पहले जब हम सांसद और केंद्र में मंत्री थे तो कई जगहों पर जाकर हमने स्वयं सहायता समूह के कामों को देखा था। देश भर में स्वयं सहायता समूह था। बिहार में स्वयं सहायता समूह की संख्या काफी कम थी। हमने स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाओं का नामकरण ‘जीविका’ किया तब से आप सभी जीविका दीदियां कहलाने लगीं। उस समय की केंद्र सरकार के मंत्री ने आकर स्वयं सहायता समूह के कामों को देखा था और काफी तारीफ की और पूरे देश में इसका नामकरण ‘आजीविका किया यानि बिहार की जीविका पूरे देश में आ जाए। भ्रम में रहने की जरूरत नहीं है क्योंकि असली जीविका है जिसके बाद ही आजीविका बना है। इसे भूलियेगा मत। आज कल मोबाइल का दौर है, उसके जरिए लोग पुरानी बातों को भुलाने की कोशिश में लगे रहते हैं। आप जीविका दीदियों की संख्या बहुत बढ़ी है यह देखकर मुझे खुशी होती है। उन्होंने कहा कि स्वयं सहायता समूह से एक करोड़ 30 लाख से अधिक महिलायें जुड़ गई हैं। 10 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूह का गठन हुआ है। पहले महिलाएं सिर्फ घर में काम करती थीं, अब पुरुष के साथ महिलाएं भी कमा रही हैं जिससे परिवार की अच्छी आमदनी हो रही है। महिलाएं आगे बढ़ेंगी तो समाज भी आगे बढ़ेगा। हमलोगों ने गरीब परिवार को आगे बढ़ाने के लिए कई काम किए हैं। आप सभी जीविका दीदियां बेहतर काम कर रही हैं। हमारा उद्देश्य है कि सभी जगह घूमकर देखें, जो योजनाएं चलाई जा रही हैं उसका लाभ लोगों को कितना मिल रहा है और क्या किए जाने की जरूरत है। आप से जो संवाद हो रहा है उससे अन्य कई बातों की जानकारी मुझे मिल रही है। आपलोगों ने जो कई अच्छे कार्य किए हैं उससे आपके परिवार और समाज में जो बदलाव हो रहा है उसकी भी जानकारी मिली है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पहले महिलाएं बोल नहीं पाती थीं और अब काफी अच्छे ढंग से अपनी बातें रख रही हैं। आपका काम महत्वपूर्ण है। आपके काम से आपके परिवार के साथ ही समाज भी आगे बढ़ रहा है। हम आपके हित में काम करते रहे हैं। पुरुष और महिला मिलकर जब काम करेंगे तो समाज का और अधिक विकास होगा। हमलोगों ने महिलाओं के उत्थान के लिये प्रारंभ से ही काम किया है। सभी अस्पतालों में दीदी की रसोई का काम शुरू कराया है ताकि आपकी आमदनी और अधिक बढ़ सके।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हमलोगों ने महिलाओं के उत्थान लिए काफी काम किया है। बिहार में सबसे पहले वर्ष 2006 में पंचायती राज संस्थाओं एवं वर्ष 2007 में नगर निकाय के चुनाव में महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत सीट आरक्षित की गई। इससे कुछ पुरुष लोग हमसे नाराज हुए थे। अब तक चार चुनाव संपन्न हो गये हैं। वर्ष 1993 में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को आरक्षण देने के लिये लोकसभा एवं राज्यसभा की एक संयुक्त कमिटी बनी थी, उस समय हम सासंद थे और इस कमिटी के सदस्य भी थे। केंद्र ने महिलाओं को कम से कम एक तिहाई आरक्षण देने का नियम बनाया। हमें जब मौका मिला तो हमने महिलाओं और पुरुषों को बराबरी का अधिकार दिया। अब काफी संख्या में साधारण परिवारों की महिलायें चुनाव जीतकर आ रही हैं। हमलोगों ने वर्ष 2013 में बिहार पुलिस की बहाली में महिलाओं को 35 प्रतिशत का आरक्षण दिया। अब पुलिस बल में बड़ी संख्या में महिलाओं की भर्ती हो रही है। बिहार में जितनी महिलाएं पुलिस में हैं उतनी दूसरे राज्यों में भी नहीं हैं। हमलोगों ने प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण दिया। इसके अलावा बिहार की सभी सरकारी सेवाओं में महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण दिया गया। हर तरह से महिलाओं को आगे बढ़ाया जा रहा है। जब हम इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते थे उस समय हमारे कॉलेज में एक भी लड़की नहीं पढ़ती थी। हमलोगों ने इंजीनियरिंग और मेडिकल के नामांकन में महिलाओं के लिये एक तिहाई सीट आरक्षित की, अब काफी संख्या में छात्रायें मेडिकल और इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही हैं। पहले परिवार की गरीबी के कारण पोशाक के अभाव में लड़कियां पढ़ नही पाती थीं। हमलोगों ने बच्चियों को पढ़ाने एवं आगे बढाने के लिए पोशाक योजना एवं साइकिल योजना शुरू की। उसके बाद बड़ी संख्या में लड़कियां विद्यालय जाने लगीं। पहले पटना शहर में भी लड़कियां साइकिल नहीं चलाती थीं। बिहार में लड़कियों के लिए लागू की गई साइकिल योजना को वर्ष 2009-10 में देश के बाहर से भी आकर लोगों ने देखा था। हमने सर्वे कराया तो पता चला कि अल्पसंख्यक और महादलित समुदाय से जुड़े काफी कम बच्चे ही शिक्षा हासिल कर पाते थे। उन्हें पढ़ाने के लिए हर तरह से काम किया गया।

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