“महिला दुष्कर्म : सभ्यता और नैतिकता का पतन” ।

✍️-बिनीत रंजन
“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।
अर्थात्- जहां नारियों का सम्मान होता है,वहीं दिव्य शक्तियाँ निवास करती हैं और जहाँ नारियों का सम्मान नहीं होता वहाँ समस्त क्रियाएं निष्फल हो जाती हैं। नारी सम्मान एक ऐसा सिद्धांत जो समाज में महिलाओं की गरिमा, उनके अधिकारों, और उनके योगदान की मान्यता को प्रकट करता है ताकि महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव, हिंसा या असमानता न हो, और उन्हें अपने जीवन के सभी पहलुओं में बराबरी का अधिकार मिले। भारतीय संस्कृति जहाँ महिला को देवी के रूप में देखा और पूजा जाता है। देवी का अर्थ ही है “दिव्य” या “शक्ति का स्रोत”। देवी का स्वरूप न केवल आध्यात्मिक बल्कि समाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह महिलाओं के सम्मान, शक्ति, और उनकी महिमा को दर्शाता है।
लेकिन दूसरी और महिलाओं के साथ निरंतर हो रहे दुर्व्यवहार और दुस्साहस समाज को बर्बरता की ओर धकेल रही है। कोलकाता के आर जी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के साथ हुई घटना वास्तव में हृदय को झकझोर कर रख देती हैं। भारतवर्ष जिसने सोलह महाजनपद और कई मातृ सत्तात्मक साम्राज्य दिया, भारतवर्ष जिसकी सभ्यता और संस्कृति पूरे विश्व में सर्वोच्च है, भारतवर्ष जहाँ महिला के सम्मान के लिए महाभारत जैसे युद्ध हुए, भारतवर्ष जिसने रानी लक्ष्मीबाई जैसी वीरांगना को जन्म दिया। आज ऐसे महान सभ्यता और संस्कृति वाले देश में महिलाओं के विरुद्ध निरंतर हो रही ऐसी घटनाएं समाज के नैतिक पतन और संवेदनहीनता का प्रतीक है। ऐसी स्थिति में सवाल यह भी उठता है कि कहीं फिर से तो हम बर्बरता की ओर नहीं जा रहे ? वास्तविकता तो यह है कि हमारा समाज आज भी कई मायनों में उस दुशासन की छाया में है , ऐसा दुशासन जो केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं बल्कि यह उस मानसिकता का प्रतीक बन गया है जो महिलाओं के साथ अन्याय, शोषण, और दुष्कर्म करता है। आज का दुशासन वे लोग हैं जो महिलाओं के अधिकारों का हनन करते हैं, उनके सम्मान को चोट पहुँचाते हैं, और उन्हें कमजोर समझते हैं।
और ताजुब की बात तो तब होती है जब ऐसे मामलों को अक्सर राजनीतिक दल अपने फायदे के लिए भुनाने की कोशिश करते हैं। सत्ता के लोभी किसी भी बड़े दुष्कर्म मामले के बाद एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं ना कि एक साथ खड़े होकर ऐसी घटनाओं का विरोध करते हैं। वर्तमान समाज भी या तो धृतराष्ट्र की भाँति अंधा, द्रोण और भीष्म की भांति मौन रहता है या दुर्योधन और बाँकी कौरवों की भांति तालियां बजाता है। दुष्कर्म के बाद कई बार पीड़िता को ही दोषी ठहराया जाता है। यह विकृति पीड़िता को न्याय के बजाय शर्म और सामाजिक बहिष्कार का सामना करने पर मजबूर करती है। समाज में इस तरह की प्रतिक्रिया न केवल अपराधियों को प्रोत्साहित करती है, बल्कि महिलाओं को आगे आने और न्याय की मांग करने से भी रोकती है। एक तरफ जहाँ हम प्रतिदिन महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं तो वहीं दूसरी और महिलाएँ तथा उनके अधिकारों का हरण और हनन किया जाता है। रिपोर्ट्स कुछ भी कहे परंतु सच्चाई तो यह है कि आज के 21वीं सदी में भी हमारे देश की दो-तिहाई महिलाएं रात्रि के पहर घर से बाहर निकलने में संकोच करती है।
महिला सुरक्षा एक सामूहिक जिम्मेदारी है, जिसे समाज के हर व्यक्ति को गंभीरता से लेना चाहिए। जब तक हम अपने आसपास के माहौल को सुरक्षित और सम्मानजनक नहीं बनाएंगे, तब तक महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी नहीं दी जा सकती। हमें एक ऐसा समाज बनाने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए जहाँ महिलाएं बिना किसी भय के स्वतंत्र रूप से जी सकें, और जहाँ उनकी सुरक्षा और सम्मान को प्राथमिकता दी जाए। महिला सुरक्षा केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है, जिसे हमें हर दिन निभाना होगा। समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान और समानता का भाव उत्पन्न करना हमारी जिम्मेदारी है। हमें उस मानसिकता को बदलना होगा जो महिलाओं को कमजोर या अधीनस्थ मानती है। यह केवल घर और परिवार से शुरू हो सकता है, जहाँ बच्चों को महिलाओं का सम्मान करने और उनके साथ समान व्यवहार करने की शिक्षा दी जाए। महिला सुरक्षा के लिए सख्त कानूनों का होना आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है उनका प्रभावी कार्यान्वयन। कानून प्रवर्तन एजेंसियों और न्यायपालिका को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी महिला के खिलाफ अपराध करने वाले को कठोर सजा मिले, और न्याय त्वरित और निष्पक्ष हो। साथ ही साथ महिलाओं को उनके कानूनी अधिकारों के बारे में जानकारी देना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब महिलाएं अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होंगी, तो वे किसी भी प्रकार के उत्पीड़न या शोषण के खिलाफ खड़ी हो सकेंगी। इसके लिए समाज में कानूनी साक्षरता अभियान चलाए जाने चाहिए, ताकि महिलाएं अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें और खुद को सुरक्षित रख सकें। मीडिया को भी जिम्मेदार तरीके से दुष्कर्म के मुद्दों को उठाना चाहिए और समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।



