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गौतम बुद्ध: “आत्मज्ञान के प्रेरणास्रोत, अटल शांति के सिद्धांतकार”

राजीव रंजन की रिपोर्ट –

बुद्ध पूर्णिमा का पर्व गौतम बुद्ध के जीवन के तीन मुख्य घटनाओं – जन्म, ज्ञान प्राप्ति और महापरिनिर्वाण के साथ जुड़ा हुआ है। गौतम बुद्ध, जिनका जन्म सिद्धार्थ गौतम के रूप में हुआ था, बौद्ध धर्म के संस्थापक थे। उनका जन्म लुंबिनी में शाक्य गणराज्य के राजा शुद्धोदन के घर हुआ था। उन्होंने जीवन के दुखों और कष्टों के कारणों की खोज में राजसी जीवन त्याग दिया। वर्षों की तपस्या और ध्यान के बाद, उन्होंने बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त किया और वे बुद्ध (जाग्रत) कहलाए। 16 वर्ष की आयु में सिद्धार्थ का विवाह यशोधरा से हुआ और उनके एक पुत्र राहुल का जन्म हुआ । एक दिन राजमहल से बाहर जाते समय सिद्धार्थ ने चार दृश्य देखे: एक बूढ़ा व्यक्ति, एक बीमार व्यक्ति, एक मृत व्यक्ति, और एक सन्यासी। इन दृश्यों ने उन्हें जीवन की अस्थायीता और कष्टों का एहसास दिलाया और उन्होंने सत्य की खोज के लिए घर छोड़ दिया। सिद्धार्थ ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की, लेकिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। अंततः उन्होंने मध्य मार्ग का अनुसरण किया और बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए उन्हें बोधि (ज्ञान) प्राप्त हुआ। इसके बाद वे गौतम बुद्ध कहलाए।
बुद्ध ने अपने ज्ञान का प्रचार करते हुए चार आर्य सत्य (दुख, दुख का कारण, दुख का निवारण, और दुख निवारण का मार्ग) और अष्टांगिक मार्ग की शिक्षा दी। उनकी शिक्षाएं करुणा, अहिंसा, और आत्मज्ञान पर आधारित थीं। बुद्ध ने अपने ज्ञान का प्रचार भारत के विभिन्न हिस्सों में किया । उनके उपदेश और शिक्षाएँ तिपिटक नामक ग्रंथों में संकलित हैं। बुद्ध का महापरिनिर्वाण कुशीनगर में हुआ था।
बिहार राज्य उनके जीवन की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी रहा है। बिहार में ही उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया और अपने धर्म का प्रचार-प्रसार किया।
बुद्ध पूर्णिमा के दिन बौद्ध मंदिरों में विशेष पूजा, ध्यान – प्रवचन , दान , दीप प्रज्ज्वलित व प्रसाद वितरण के साथ भक्त बुद्ध की प्रतिमा के सामने प्रार्थना करते हैं और ध्यान लगाते हैं
बुद्ध पूर्णिमा न केवल भारत में, बल्कि अन्य बौद्ध बहुल देशों जैसे नेपाल, श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार, भूटान, तिब्बत, जापान, और कोरिया में भी धूमधाम से मनाई जाती है। हर देश में इसे मनाने के तरीकों में कुछ भिन्नताएँ हो सकती हैं, लेकिन सभी का उद्देश्य बुद्ध की शिक्षाओं को सम्मान देना और उनके संदेश को फैलाना होता है । बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर भारत में बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, और वैशाली जैसे महत्वपूर्ण बौद्ध स्थलों पर विशेष आयोजन होते हैं। ये स्थल बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए तीर्थ स्थल का कार्य करते हैं, जहाँ वे बुद्ध की शिक्षाओं का अनुसरण करने और ध्यान करने के लिए एकत्र होते हैं। बुद्ध पूर्णिमा एक ऐसा अवसर है जो न केवल बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए शांति, करुणा, और ज्ञान का संदेश फैलाता है। यह दिन हमें बुद्ध के जीवन और उनकी शिक्षाओं की महानता को याद दिलाता है और हमें अपने जीवन में उनकी शिक्षाओं को लागू करने की प्रेरणा देता है। भगवान बुद्ध ने उपदेश देते हुए कहा था ” अप्प दीपो भवः” यानि मनुष्य को अपना दीपक स्वयं बनना चाहिए।

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